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भाषा-आधारित आरक्षण

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१४ सितंबर १९४९ को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया था कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर सन् १९५३ से संपूर्ण भारत में १४ सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष भी हिन्दी दिवस मनाया गया एवं विशेष तौर पर कई वर्षो बाद विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन भी हुआ जिसमे प्रधानमंत्रीजी ने हिंदी के सम्मान में लम्बा चौड़ा भाषण दिया लेकिन निचे दिए गए आज के अख़बार दैनिक यशोभूमि में मुद्रित समाचार के इस अंश को देखिये की हिन्दी दिवस को बीते हुए अभी ४८ घंटे भी नहीं हुए थे और इस राजभाषा को उसी के गणराज्य में राजकीय तौर पर अपरोक्ष रूप में किस तरह उपेक्षित किया जा रहा है.हिन्दी भाषा बोलने के अनुसार से अंग्रेज़ी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है।


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बीजेपी शासित महाराष्ट्र सरकार में शिव सेना के कोटे से बने परिवहन मंत्री श्री दिवाकर रावते का यह तर्क है ऑटो चलाने वालो को स्थानीय भाषा का ज्ञान हो जिससे वो उपभोक्ता से आसानी से बात कर सके.अगर स्थानीय भाषा और उपभोक्ता सेवाओं की इनको इतनी ही चिंता है तो इन्हे ये भी सुनिश्चित करना चाहिए की राज्य के प्रत्येक अस्पताल के डॉक्टरों को भी मराठी भाषा का ज्ञान हो! बड़ी बड़ी टैक्सी कम्पनियो को टैक्सी परिचालन के लिए बृहत् पैमाने पर परमिटों के आबंटन पर क्यो यह राजकीय फ़तवा लागु नहीं होता है? शायद कुछ टैक्सी कम्पनियो के राजनैतिक ताल्लुकात इतने प्रभावशाली है जिसमे समाज कल्याण की सोच और उससे जुडी व्यवस्था का कद छोटा बन जाता है!

भाषा के नाम पर संवैधानिक तौर पर अमान्यताप्राप्त आरक्षण एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था प्रदत्त तानाशाही है जिसका मक़सद सिर्फ और सिर्फ समाज का ध्रुबीकरण कर भावनात्मक तौर पर वोट बैंक तैयार करना है.हमारे देश में जातिगत आरक्षण ने पहले से ही समाज को कई टुकड़ो में विभाजित कर रखा है और ऊपर से इस तरह का सरकारी फ़तवा समाज कल्याण के लिए भाषा के नाम पर जबरन थोपी हुई राजनैतिक कृपा दृष्टि के रूप में मजबुरी है जो जन कल्याण हेतु संबिधान प्रदत्त अधिकारो को पक्षपात पूर्ण बनाता है।

भारतीय लोकतंत्र में बात बात पर आरक्षण या आरक्षण से मिलता जुलता कानून राजनैतिक प्रतिस्पर्धा में वोट मांगने और वोट बैंक बनाने की दोहरी राजनीति की मज़बूरी है या फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में दूरदर्शी सोच का आभाव, स्थिति कैसी भी हो,समाज को पक्षपातपूर्ण सोच के आधार पर बांटकर समाज का विकास नहीं किया जा सकता वल्कि इससे तो हम अपनी समाज की परिधि को छोटा और संकुचित कर रहे है,इसमें जन कल्याण और विकास की बात सोचना भी मुर्खता है।



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